हर मास में, आपके सामने में एक ध्यानतंत्र रखुंगा | इसमें मूल संस्कृत श्लोक के साथ स्वामी सत्यसंगानंदा सरस्वती द्वारा किया हुआ अंग्रेजीमें वस्तुतः अनुवाद रहेगा | तथा हिंदीमें व्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा लिखा हुआ हिंदी भावानुवाद रहेगा | अन्तमें ओशो रजनीश द्वारा उस ध्यान तंत्र पर दिये हुए भाषण का सार तथा उसका मैने किया हुआ मराठी भावानुवाद रहेगा |
मेरा आपसे अनुरोध है की यह ध्यान तंत्र केवल जानकारी हेतू पढने के बजाय इसकी अनुभूती करने का प्रयास करे
| अपने स्वभाव विशेष के अनुसार
इसमेसे एक ही तंत्र आपको अंतिम अनुभूती देनेमें सक्षम है | इसकी खोज आपको करनी है |
हरी ओम तत् सत् !
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Every month I will be sharing one technique of meditation. There will be original Sanskrut text, and English / Marathi / Hindi commentary on the technique. I expect reader should not take it as just a piece of information but practice the technique that suits him/her for at least one month to further the spiritual quest.
| These 112 meditation techniques are the ultimate source for self-realization |
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मानसं
चेतना शक्तिरात्मा चेति चतुष्ट्ययम |
यदा
प्रिये परिक्षणं तडा तदभैरवं वपु: ||
O dear one, when
the mind, awareness, energy and individual self, this set of four dissolves,
then the state of bhairava manifests.
संकल्पात्मक मन, चेतानात्मक बुद्धि, प्राणात्मक शक्ती और इनसे उपहित परिमित प्रमाता
ये चारो जब सब तरह से
विलीन हो जाते है अर्थात ये साधक को चिति के चमत्कारमात्र प्रतीत होने लगते है, तब
वह भैरव स्वरूप को प्राप्त कर लेता है | इस स्थिती में साधक हिम से निर्मुक्त
सूर्य के समान मायीय आवरणो से निर्मुक्त चिति के प्रकाश से आलोकित हो उठता है,
प्रकाशमय बन जाता है | अर्थात इस तरह की भावना का दृढ अभ्यास करने पर साधक साक्षात
भैरव हो जाता है |
Dissolution
of the set of four
(I
am bhairava)
In order to
experience the state of bhairava, one have to give up everything that is
individual, which includes the self. The senses and mind siply have no access
to that dimension or range of experience to reach the sennlf. This dharana asks
you to dissolve the set of four i.e. mind, awareness, energy and individual
self. The resulting experience through this process of alchemy is the state of
bhairava.
जेव्हा
दृढनिश्चयी मन, चेतन बुद्धी,
प्राणशक्ती आणि त्यांपासून उत्पन्न झालेला मर्यादित द्रष्टा,
हे चारही घटक सर्व प्रकारे विलीन होतात,
म्हणजेच, जेव्हा ते साधकाला
चेतनेचे केवळ चमत्कार म्हणून दिसू लागतात, तेव्हा
तो भैरवाचे स्वरूप प्राप्त करतो. या अवस्थेत, साधक
मायेच्या आवरणांपासून मुक्त झालेल्या चेतनेच्या प्रकाशाने,
जसा सूर्य बर्फातून मुक्त होतो, तसा
प्रकाशित होतो. म्हणजेच, अशा भावनेचा दृढपणे
सराव केल्याने, साधक स्वतः भैरव
बनतो.
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