Saturday, October 31, 2026

Vidnyan Bhairav Tantra: Inquiry into the nature of reality Part 3

Essence of tantra

प्रसादंकुरुमे नाथ नि:शेषंछिन्धिसंशयम् |

भैरव उवाच

साधु साधुत्वयापृष्टंतन्त्रसारमिदमप्रिये||

O Lord, by your blessings, please destroy all my doubts completely. Then Bhiarava says: Good, well spoken, O dear one! What you have asked about is the essence of tantra.

 

हे नाथ, मेरे उपर आप अनुग्रह किजिये; वाणी, शरीर और मन में एक होकर आप मेरे उपर कृपादृष्टी डालिये; माया, महामाया आदि के संसर्ग से प्राप्त कालुष्य को दूर कर अपने निर्मल स्वरूप को मुझे बताइये और मेरे इस संशय को आप मिटा दीजिये |

हे प्रिये, परानंद से प्राप्त होने वाली तृप्ति के प्रसिद्धि में तत्पर, अत एव सबका भला करनेवाली हे देवी, यह तुमने बहुत अच्छे प्रश्न पूछे है | सब शास्त्रो की सारभूत बात अत्यंत गोपनीय है |

 

हे स्वामि, कृपया मला आशीर्वाद द्या; वाणी, शरीर आणि मनाने एकरूप होऊन तुमची कृपादृष्टी टाका; माया, महामाया इत्यादींच्या संपर्काने प्राप्त झालेली अशुद्धता दूर करा आणि मला तुमचे शुद्ध रूप प्रकट करून माझी ही शंका दूर करा.

हे देवी, परम आनंदातून मिळणाऱ्या समाधानाची घोषणा करण्यास उत्सुक आणि म्हणूनच सर्वांची हितचिंतक असलेल्या तुम्ही, अतिशय चांगले प्रश्न विचारले आहेत. सर्व शास्त्रांचे सार अत्यंत गोपनीय असते.

 

Forms of Bhairava

गृहनीयतं भद्रे तथापिकथयामि ते |

यत्किंचितसकलं रूपं भैरवस्य प्रकीर्तितम् ||

Nobel lady, although this is the most secret part of the tantras, yet I will speak what has been expounded regarding the defined forms of Bhairava.

 

इस गोपनीय रहस्य को तुम्हे में इसलिये बताता हू कि, तुम में अनुत्तम पद में एकाकार होने की उन्मुखता के कारण इस रहस्य को जानने की योग्यता विद्यमान है | भैरव के सकल और विकल ये दो रूप शास्त्रोमे बताये गये है |

 

मी हे रहस्य तुम्हाला प्रकट करत आहे, कारण परम अवस्थेशी विलीन होण्याच्या तुमच्या प्रवृत्तीमुळे, हे रहस्य समजून घेण्याची क्षमता तुमच्यामध्ये आहे. भैरवाची सकल आणि विकल ही दोन रूपे शास्त्रांमध्ये वर्णन केलेली आहेत.

 

Sakara aspect of Bhairava

तद्सारतयादेविविज्ञेयंशक्रजालवत् |

मायास्वप्नोपमंचैवगन्धर्वनगरभ्रमम् ||

O Devi, the sakara aspect of Bhiarava is insubstantial and of no spiritual value, like the illusory dream-like web of Indra, and is also like the delusion of celestial musicians.

 

सकल नाम से प्रसिद्ध यह जगत रूप नाना विचित्र रुपो मे भासित होता है, वह सब इंद्रजाल के समान माया से निर्मित और गंधर्व-नगर के भ्रम के समान, स्वप्न में देखी गई वस्तु के समान अस्थिर और असत्स्वरूप है | सकल स्वरूप का यह उपदेश तत्व के जिज्ञासुओ के लिये नही है |

 

सकल नावाने ओळखले जाणारे हे ऐहिक स्वरूप विविध विचित्र रूपांत प्रकट होते; हे सर्व मायेतून निर्माण झालेले आहे, जादूगाराच्या जादूप्रमाणे, गंधर्व-नगराच्या भ्रमाप्रमाणे, स्वप्नात दिसणाऱ्या वस्तूप्रमाणे, अस्थिर आणि अवास्तव. सकल स्वरूपावरील ही शिकवण, जे मूलभूत ज्ञानासाठी जिज्ञासू आहेत त्यांच्यासाठी नाही.

Wednesday, September 30, 2026

Vidnyan Bhairav Tantra: Inquiry into the nature of reality Part 2

By what experience this reality is known

नादबिंदुमयंवापिकिंचंद्रार्धनिरोधिकः|

चक्रारूढमनच्कम वा किं वा शक्तिस्वरुपकम् ||

Is it nada and bindu or can it be known by concentrating on the ascending psychic centres or the unstruck sound which emanates without any vibration? Or is it the form of obstructing half-moon or else is it the form of shakti?

अथवा नर-शक्ती-शिवात्मक तत्वत्रय की अधिष्ठात्री अपरा, परापरा और परा नामक तीन शक्तियो वाला यह है? अथवा समस्त मंत्रसमूह में सामान्यतः मंत्रवीर्य के रूप में जो अवस्थित है, यह विश्व के सभी वाच्यो में अभिन्न रूप से विद्यमान प्रकाशस्वरूप बिंदू और समस्त वाचको में अभिन्न रूप से विद्यमान विमर्शस्वरूप नाद उसका स्वरूप है? अथवा इस बिंदू और नाद के ही प्रपंचरूप अर्धचंद्र, निरोधिका आदि उसके रूप है ?

किंवा ती अपरा, परापरा आणि परा नावाच्या तीन शक्तींनी युक्त, नर-शक्ती-शिव्यक्ती तत्त्वत्रयाची अधिष्ठात्री देवता आहे का? किंवा, संपूर्ण मंत्रसमूहात सामान्यतः मंत्रवीर्याच्या रूपात जे उपस्थित असते, तो जगातील सर्व भाषकांमध्ये एकात्मपणे उपस्थित असलेला प्रकाशरूपातील बिंदू आणि चर्चेचे रूपरूपातील नाद आहे का? किंवा, या बिंदू आणि नादाची वैश्विक रूपे स्वतः अर्धचंद्र, निरोधिका इत्यादींसारखी आहेत का?

 

Transcendent or Immanent

परापरायाःसकलमअपरायाश्च वा पुनः|

परायायदीतद्वत्स्यातपरत्वमतद्विरुध्यते||

Is your reality transcendent and immanent or is it completely immanent or completely transcendental? If it is immanent then the very nature of transcendence is contradicted.

परात्रिशिका प्रभृति ग्रंथो में मंत्रविशेष का ध्यान करने योग्य जो विशेष सकल स्वरूप बताया गया है, वह परापरा देवी का है, अपरा देवी का है, अथवा परा देवी का?

परत्रिशिका इत्यादी ग्रंथांमध्ये, ध्यान करण्यायोग्य म्हणून वर्णन केलेले एखाद्या विशिष्ट मंत्राचे विशेष स्वरूप, परापरा देवीचे, अपारा देवीचे की परा देवीचे आहे?

 

Indivisible and indefinable

नही वर्ण-विभेदेनदेह्भेदेन व भवेत् |

परत्वम, निष्कलत्वेन, सकलत्वे न तदभवेत् ||

Paratva, or transcendence, cannot exist in the divisions of varna (colour), Shabda (sound), or roopa (form). If transcendence is indivisible, then it cannot be defined or co-exist with composite parts.

वर्णो की विशेषता के आधार पर अथवा अक्षरो की विशेषता के आधार पर या शरीर की सूर, नर, तिर्यक के रूप में आकृति की विशेषता के कारण अथवा द्वाद्शांत प्रभृति शरीर के विशेष स्थानो का सहारा लेने के कारण परत्व नही होता, किन्तु निष्कलता अर्थात कलना की शून्यता की अवस्था में ही वह निष्पन्न होता है |

अक्षरांच्या वैशिष्ट्याच्या आधारावर किंवा वर्णमालेच्या वैशिष्ट्याच्या आधारावर किंवा सूर, नर, तिर्यक या स्वरूपातील शरीराच्या आकाराच्या वैशिष्ट्याच्या आधारावर किंवा द्वादशांत इत्यादींसारख्या शरीरातील विशेष स्थानांचा आधार घेऊन ते शुद्ध होत नाही, परंतु ते केवळ निष्कल्त म्हणजेच गणनेच्या शून्यता अवस्थेतच प्राप्त होते.

 

Monday, August 31, 2026

Vidnyan Bhairav Tantra: Inquiry into the nature of reality Part 1

 Rudrayamala and Trika

श्रुतं देव मया सर्वं रुद्र्यामलसंभवम् |

त्रिकभेदमशेषेण सारात्सारविभागशः||

Sri Devi says:

O Deva, I have heard in detail all that has been revealed through the union of Rudra and his Shakti or what has emerged from the Rudrayamala Tantra. I have also understood Trika, or the three divisions of Shakti, which forms the quintessence of all knowledge.

वेद से श्रेष्ठ शैव शास्त्र, शैव से श्रेष्ठ वाम, वाम से श्रेष्ठ दक्षिण, दक्षिण से कौल, और उससे भी श्रेष्ठतर त्रिक शास्त्र है | त्रिक शास्त्र में भी सिद्धा, मालिनी और उत्तर शासन क्रमशः उत्कृष्ट माने जाते है | इन सब शास्त्रो को, जो कि एक से एक बढकर है, मैने सुना है |

वेदांपेक्षा शैव धर्मग्रंथ श्रेष्ठ आहेत, शैव धर्मग्रंथांपेक्षा श्रेष्ठ वाम, वाम धर्मग्रंथांपेक्षा श्रेष्ठ दक्षिण, दक्षिण धर्मग्रंथांपेक्षा श्रेष्ठ कौल, आणि त्याहीपेक्षा श्रेष्ठ त्रिक धर्मग्रंथ आहेत. त्रिक धर्मग्रंथांमध्ये, अनुक्रमे सिद्ध, मालिनी आणि उत्तरा शासन हे सर्वोत्तम मानले जातात. मी या सर्व धर्मग्रंथांविषयी ऐकले आहे, आणि प्रत्येक धर्मग्रंथ दुसऱ्यापेक्षा श्रेष्ठ आहे.

 

Reality of Bhairava

अद्यापि न निवृत्तो मे संशयः परमेश्वर|

किं रूपं तत्त्वतो देव शब्दराशिकलामयम् ||

O Supreme Lord, in spite of everything that I have heard, even today my doubts are not dispelled. What is your reality. O Divine One? Are you the power or energy contained in sound from which all the mantras have originated?

परंतु इन सब शास्त्रो को सुनकर भी मेरा संशय अभी दूर नही हुआ है | क्या यह बोध-भैरव शब्दब्रम्ह स्वरूप है ? क्या यही परम तत्व का वास्तविक स्वरूप है ?  

पण हे सर्व शास्त्र ऐकूनही माझ्या शंका अनुत्तरित राहिल्या आहेत. हा बोधभैरव शब्दब्रह्माचे खरे स्वरूप आहे का? हेच परमेश्वराचे खरे स्वरूप आहे का?


How the reality of Bhiarava is perceived

किं वा नवात्मभेदेन भैरवे भैरवाकृतौ|

त्रिशिरोभेदभिन्नं वा किं वा शक्तित्रयात्मकम् ||

Can your reality be perceived through the nine different ways by which one can enter the realm of higher consciousness, as enumerated in Bhairava Agama? Is it different from the procedure in Trishira Bhairava Tantra? Or can it be perceived through knowledge of the triple forms of shakit, ie para, parapara and apara? These are my doubts, O Bhairava!

अथवा त्रिशिरोभैरव तंत्र में निर्दिष्ट नर-शक्ती-शिवात्मक, मातृ-मान-मेयात्मक अथवा इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक समस्त तत्वत्रय परामर्श को अपने में समेटे हुए विशिष्ट मंत्र के स्वरूप में वह विद्यमान है ?

किंवा ते एका विशिष्ट मंत्राच्या स्वरूपात अस्तित्वात आहे का, ज्यामध्ये त्रिशिरोभैरव तंत्रात सांगितलेले उपदेशाचे तिन्ही घटक, म्हणजेच पुरुष-शक्ती-शिव, मातृ-आदर-मेया किंवा इच्छा-ज्ञान-कर्म, अंतर्भूत आहेत?


Friday, July 31, 2026

Meditation techniques (ध्यान तंत्र: VBT विज्ञान भैरव तंत्र) 112e

हर मास में, आपके सामने में एक ध्यानतंत्र रखुंगा | इसमें मूल संस्कृत श्लोक के साथ स्वामी सत्यसंगानंदा सरस्वती द्वारा किया हुआ अंग्रेजीमें वस्तुतः अनुवाद रहेगा | तथा हिंदीमें व्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा लिखा हुआ हिंदी भावानुवाद रहेगा | अन्तमें ओशो रजनीश द्वारा उस ध्यान तंत्र पर दिये हुए भाषण का सार तथा उसका मैने किया हुआ मराठी भावानुवाद रहेगा |

मेरा आपसे अनुरोध है की यह ध्यान तंत्र केवल जानकारी हेतू पढने के बजाय इसकी अनुभूती करने का प्रयास करे | अपने स्वभाव विशेष के अनुसार इसमेसे एक ही तंत्र आपको अंतिम अनुभूती देनेमें सक्षम है | इसकी खोज आपको करनी है |

हरी ओम तत् सत् !             

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Every month I will be sharing one technique of meditation. There will be original Sanskrut text, and English / Marathi / Hindi commentary on the technique. I expect reader should not take it as just a piece of information but practice the technique that suits him/her for at least one month to further the spiritual quest.

 

| These 112 meditation techniques are the ultimate source for self-realization | 

 

अजरामरतामेति सोsणीमादिगुणान्वितः |

योगिनीनाम प्रियो देवी सर्वमेलापकाधिपः |

जीवान्नपि विमुक्तोsसौ कुर्वन्नपि न लिप्यते |

 

O Godess, by virtue of even one of these dharanas, the sadhaka becomes free from old age, attains immortality and endowed with siddhis such as anima, etc. He becomes the darling of all yoginis and master of all siddhas. He is liberated while living and not affected by the activities of the world while active.

 

जैसे देवगण सोमरस का पान कर अजर-अमर हो गये, उसी तरह से उपर बताई गयी धारणामें दृढ अभ्यास से प्राप्त हुए विज्ञान रुपी सोमरस का पान कर योगी अजर और अमरही हो जाता है| उसको अणिमा प्रभृति सिद्धीया प्राप्त हो जाती है | वह योगीनियोका ज्ञान-क्रिया-आनंद प्रभृति शक्तियो का स्वामी हो जाता है और सभी मेलापको का अधिपति बन जाता है | इस प्रकार का साधक जीवन्मुक्त कहलाता है | वह सभी प्रकार के क्रियाकलापों को करता हुआ भी उनमे लिप्त नही होता, उसमे रस नही लेता है |

 

Master of yogis and siddhas

(Path towards immortality)

Each of the dharanas described so far has the potential power to completely alter the molecular structure and transform the awareness. The worries, anxieties, desires and thoughts that assail us are the cause of aging, ignorance and impotence in our lives. But one who has transcended theses becomes the favourite amongst the enlightened and attains the most favoured status.

 

 

ज्याप्रमाणे सोमरस प्राशन करून देव अमर झाले, त्याचप्रमाणे, वर उल्लेखलेल्या धारणेच्या दृढ अभ्यासाने प्राप्त झालेल्या ज्ञानाचा सोमरस प्राशन करून योगी अमर आणि शाश्वत होतो. त्याला अणिमा इत्यादी सिद्धी प्राप्त होतात. तो योगिनींच्या ज्ञान, कर्म, आनंद इत्यादी शक्तींचा स्वामी आणि सर्व संयोगांचा शासक बनतो. अशा साधकाला जीवनमुक्त म्हटले जाते. सर्व प्रकारची कार्ये करत असतानाही, तो त्यात गुंतत नाही, त्यात रस घेत नाही.

 

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Tuesday, June 30, 2026

Meditation techniques (ध्यान तंत्र: VBT विज्ञान भैरव तंत्र) 112d

हर मास में, आपके सामने में एक ध्यानतंत्र रखुंगा | इसमें मूल संस्कृत श्लोक के साथ स्वामी सत्यसंगानंदा सरस्वती द्वारा किया हुआ अंग्रेजीमें वस्तुतः अनुवाद रहेगा | तथा हिंदीमें व्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा लिखा हुआ हिंदी भावानुवाद रहेगा | अन्तमें ओशो रजनीश द्वारा उस ध्यान तंत्र पर दिये हुए भाषण का सार तथा उसका मैने किया हुआ मराठी भावानुवाद रहेगा |

मेरा आपसे अनुरोध है की यह ध्यान तंत्र केवल जानकारी हेतू पढने के बजाय इसकी अनुभूती करने का प्रयास करे | अपने स्वभाव विशेष के अनुसार इसमेसे एक ही तंत्र आपको अंतिम अनुभूती देनेमें सक्षम है | इसकी खोज आपको करनी है |

हरी ओम तत् सत् !             

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Every month I will be sharing one technique of meditation. There will be original Sanskrut text, and English / Marathi / Hindi commentary on the technique. I expect reader should not take it as just a piece of information but practice the technique that suits him/her for at least one month to further the spiritual quest.

 

| These 112 meditation techniques are the ultimate source for self-realization | 


अत्र चैकतमे युक्तो जायते भैरव: स्वयम |

वाचा करोति कर्माणि शापानुग्रहकारकः ||

One attains the state of bhairava, if established even in one of these 112 techniques, and by his speech he confers blessings or curses.

 

अब तक बताये गये उपदेशो में से किसी एक में भी समाहित हो जाने वाला साधक, अर्थात इन धारणाओ मे से किसी एक का भी निष्टापूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी, भले ही मायामय उपाधि से आविर्भूत जागतिक प्रपंच में रम रहा हो, बिना प्रयत्न से वचन मात्र से सब कुछ कर सकता है, किसी को भी शाप या वरदान देने में समर्थ हो सकता है | इस प्रकार का सामर्थ्य आ जाने पर भी जो साधक इसका उपयोग न कर निरंतर समाधि में लीन बना रहता है, उसके चित्त में स्थिर आत्मस्वरूप की अभिव्यक्ती हो जाती है, वह स्वयं साक्षात भैरव बन जाता है, यह धृव सत्य है |

 

Perfection on one dhrana

(Importance of abhyas)

The one hundred and twelve dharanas that have been described are so effective that, even if one of them is mastered, the state of bhairava is experienced. That state of consciousness is so powerful that the words uttered by such person inevitably come true. In this way, speech confers on blessings or curses, as one becomes a medium for the transmission of divine energy in this world.

 

आतापर्यंत सांगितलेल्या धारणांपैकी पैकी कोणत्याही एका धारणेत तल्लीन झालेला साधक, म्हणजेच यापैकी कोणत्याही संकल्पनेचा प्रामाणिकपणे सराव करणारा योगी, जरी तो मायावी उपाधीमुळे निर्माण झालेल्या सांसारिक गोष्टींमध्ये गुंतलेला असला तरी, केवळ शब्दांनी कोणत्याही प्रयत्नाशिवाय सर्व काही करू शकतो, तो कोणालाही शाप किंवा आशीर्वाद देण्यास सक्षम होऊ शकतो. अशी शक्ती प्राप्त केल्यानंतरही, जो साधक तिचा वापर करत नाही आणि सतत ध्यानात तल्लीन राहतो, त्याच्या मनात आत्म्याचे स्थिर स्वरूप प्रकट होते, तो स्वतःच भैरव बनतो, हे एक परम सत्य आहे.

 

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