Tuesday, January 31, 2023

Meditation techniques (ध्यान तंत्र: (VBT 75) विज्ञान भैरव तंत्र ७५)

हर मास में, आपके सामने में एक ध्यानतंत्र रखुंगा | इसमें मूल संस्कृत श्लोक के साथ स्वामी सत्यसंगानंदा सरस्वती द्वारा किया हुआ अंग्रेजीमें वस्तुतः अनुवाद रहेगा | तथा हिंदीमें व्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा लिखा हुआ हिंदी भावानुवाद रहेगा | अन्तमें ओशो रजनीश द्वारा उस ध्यान तंत्र पर दिये हुए भाषण का सार तथा उसका मैने किया हुआ मराठी भावानुवाद रहेगा |

मेरा आपसे अनुरोध है की यह ध्यान तंत्र केवल जानकारी हेतू पढने के बजाय इसकी अनुभूती करने का प्रयास करे | अपने स्वभाव विशेष के अनुसार इसमेसे एक ही तंत्र आपको अंतिम अनुभूती देनेमें सक्षम है | इसकी खोज आपको करनी है |

हरी ओम त् सत् !           

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Every month I will be sharing one technique of meditation. There will be original Sanskrut text, and English / Marathi / Hindi commentary on the technique. I expect reader should not take it as just a piece of information but practice the technique that suits him/her for at least one month to further the spiritual quest.

 

| These 112 meditation techniques are the ultimate source for self-realization | 

  

विज्ञान भैरव तंत्र    

VidnyanBhairav Tantra

 

श्री देव्युवाच

श्रुतं देव मया सर्वं रुद्रयामलसम्भवम् |

त्रिकभेदमशेषेणसारात्सारविभागशः ||

 

अद्यपि न निवृत्तोमे संशय: परमेश्वर |

किं रुपं तत्वतो देव शब्दराशिकलामयम् ||

 

किं वा नवात्मभेदेन भैरवे भैरवाकृतौ |

त्रिशिरोभेदभिन्नं वा किं वा शक्तित्रयात्मकम् ||

 

नादबिन्दुमयंवापिकिंचंद्रार्धनिरोधिका: |

चक्रारुढमनच्कं वा किं वा शक्तिस्वरुपकम् ||

 

परापराया: सकलम्अपरायाश्च वा पुनः |

परायायदितद्वत्स्यात्परत्वंतद्विरुध्यते ||

 

नहि वर्ण विभेदेनदेहभेदेन वा भवेत् |

परत्वंनिष्कलत्वेनसकलत्वे न तदभवेत् ||

 

प्रसादंकुरुमे नाथ नि:शेषंछिन्धिसंशयम् |

 

भैरव उवाच

साधु साधुत्वयापृष्टंतन्त्रसारमिदंप्रिये |

 

गूहनीयतमं भद्रे तथापिकथयामि ते |

यत्किञ्चित्सकलं रुपं भैरवस्यप्रकीर्तितम् ||

 

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देवीने प्रश्न किया...

हे शिवा! आपका सत्य स्वरूप क्या है?

यह आश्चर्य से भरा जगत्क्या है?

बीज का मूलतत्वक्या है?

संसाररुपी चक्र के केंद्रस्थान पर क्या है?

सगुण विश्व के परे क्या है?

निर्गुण अमृतत्वको पाना क्या संभव है?

कृपया मेरे प्रश्नों का समाधान किजीये...

 

शिव ने उत्तर स्वरूप ११२ ध्यानतंत्र का प्रस्फुटन किया | अखिल विश्व के सभी पंथ-संप्रदाय इसीके एक अथवा अधिक तंत्र पद्धती केउपयोग से उत्पन्न हुए है | भूत, वर्तमान और भविष्य के संत, प्रेषित इसी तंत्र पद्धती के फलस्वरूप है |

 

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देवीने विचारले...

 

हे शिवा! तुझे खरे स्वरुप काय आहे?

हे अचंबित करणारे जगत काय आहे?

बीजाचे मूलतत्व काय आहे?

संसाररुपी चक्राच्या केंद्रस्थानी काय आहे?

नामरुपांच्यापलिकडे काय आहे?

नामरुपातीतअमृतत्वाची प्राप्ती शक्य आहे का?

कृपया माझे शंकानिरसन करा...

 

शिवाने उत्तरादाखल ११२ ध्यानतंत्रे सांगितली. ज्ञात-अज्ञात विश्वातील सर्व पंथसंप्रदाय,ज्ञानमार्ग यातील एक अथवा अधिक तंत्र पद्धतीद्वारा उत्पन्न झाले. भूतवर्तमान तसेच भविष्य काळातील तत्त्ववेत्तेप्रेषित यातील एक अथवा अधिक तंत्रपद्धतीचे फलस्वरुप आहेत.  

 

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 Devi Asks:

O Shiva, what is your reality?

What is this wonder-filled universe?

What constitutes seed?

Who centres the universal wheel?

What is this life beyond form pervading forms?

How may we enter it full, above space and time, names and descriptions?

Let my doubts be cleared!

Now Shiva replies and describes 112 meditation techniques.  All the religions of the world, all the seers of the world, have reached the peak through some technique or other, and all those techniques will be in these one hundred and twelve techniques.

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तंत्र ७५ 

 

निर्निमित्तम भवेज्ज्ञानं निराधाराम भ्रमात्मकम |

तत्वतः कस्यचिन्नैतदेवंभावी शिवः प्रिये ||

O dear one, compared to absolute knowledge, all relative knowledge is without cause, and thus becomes baseless and deceptive. In reality, knowledge does not belong to any one person. Contemplating like this, one becomes shiva.

 

हे प्रिये, यह जो घट आदि का ज्ञान है, उसका कोई आधार नही है, क्योकी वस्तुतः किसी स्थिर आत्मा अथवा घट आदि वस्तुओ की कोई वास्तविक सत्ता नही है | इसी लिये यह निर्हेतुक भी है, चक्षु, आलोक आदि पदार्थो की भी वास्तविक सत्ता नही है | इसी लिये यह सबकुछ भ्रमात्मक है, माया के कारण उत्पन्न है | अत एव विकल्प-स्वरूप है, क्यो की ज्ञान के अतिरिक्त सभी वस्तुओ का अभाव है | इस तरह से अन्ततः सब कुछ चिन्मात्र, विज्ञानात्मक ही सिद्ध होता है | इस चिदात्मक विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी की भी सत्ता नही है, इस तरह की भावना का दृढता से अभ्यास करने से साधक शिव हो जाता है|

 

Waking, dreaming, sleeping know you as light

(Dharana on knowledge)

 

Waking, dreaming and sleep are three states of your mind. Consciousness is beyond these three stages. In waking you mould yourself according to society, in dreaming you are with your desires, in sleep, you are with nature and only beyond these three you are with absolute. Western word is interested in knowing these states while eastern world is interested in transcending these stages. Imagine yourself as flame, first in waking and then dreaming. Once you see the flame in dreams, you will enter the deep sleep which will happen only to your body and not you. Consciousness does not need any rest, does not become old. You are mere traveler through these three stages and remains beyond all of them.

 

जागृती, स्वप्न, निद्रावस्थांपलिकडे तुरियावस्था...

 

जागृतावस्था ही समाजाने लादलेली. प्रत्येक संस्कृती, विचारधारा म्हणजे एक साचा. केवळ स्वप्नावस्थेत व्यक्ती स्वतंत्र. व्यक्तीला जाणण्यासाठी त्याची स्वप्ने जाणणे आवश्यक. प्रत्येक व्यक्ती म्हणजे ज्योतीची ठिणगी. ज्योतीरुप आत्मतत्वाची अनुभूती प्रथम जागृतावस्थेत आणी नंतर स्वप्नावस्थेत घेताना स्वप्नांचे निराकरण. शरीराला निद्रा आवश्यक, आत्मतत्वाला नाही. तीनही अवस्थांपलिकडे असणार्‍या आत्मतत्वाची अनुभूती म्हणजे तुरियावस्था.

 

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