Saturday, April 29, 2023

Meditation techniques (ध्यान तंत्र: (VBT 78) विज्ञान भैरव तंत्र ७८)

हर मास में, आपके सामने में एक ध्यानतंत्र रखुंगा | इसमें मूल संस्कृत श्लोक के साथ स्वामी सत्यसंगानंदा सरस्वती द्वारा किया हुआ अंग्रेजीमें वस्तुतः अनुवाद रहेगा | तथा हिंदीमें व्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा लिखा हुआ हिंदी भावानुवाद रहेगा | अन्तमें ओशो रजनीश द्वारा उस ध्यान तंत्र पर दिये हुए भाषण का सार तथा उसका मैने किया हुआ मराठी भावानुवाद रहेगा |

मेरा आपसे अनुरोध है की यह ध्यान तंत्र केवल जानकारी हेतू पढने के बजाय इसकी अनुभूती करने का प्रयास करे | अपने स्वभाव विशेष के अनुसार इसमेसे एक ही तंत्र आपको अंतिम अनुभूती देनेमें सक्षम है | इसकी खोज आपको करनी है |

हरी ओम त् सत् !           

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Every month I will be sharing one technique of meditation. There will be original Sanskrut text, and English / Marathi / Hindi commentary on the technique. I expect reader should not take it as just a piece of information but practice the technique that suits him/her for at least one month to further the spiritual quest.

 

| These 112 meditation techniques are the ultimate source for self-realization |  

 

विज्ञान भैरव तंत्र    

VidnyanBhairav Tantra

 

श्री देव्युवाच

श्रुतं देव मया सर्वं रुद्रयामलसम्भवम् |

त्रिकभेदमशेषेणसारात्सारविभागशः ||

 

अद्यपि न निवृत्तोमे संशय: परमेश्वर |

किं रुपं तत्वतो देव शब्दराशिकलामयम् ||

 

किं वा नवात्मभेदेन भैरवे भैरवाकृतौ |

त्रिशिरोभेदभिन्नं वा किं वा शक्तित्रयात्मकम् ||

 

नादबिन्दुमयंवापिकिंचंद्रार्धनिरोधिका: |

चक्रारुढमनच्कं वा किं वा शक्तिस्वरुपकम् ||

 

परापराया: सकलम्अपरायाश्च वा पुनः |

परायायदितद्वत्स्यात्परत्वंतद्विरुध्यते ||

 

नहि वर्ण विभेदेनदेहभेदेन वा भवेत् |

परत्वंनिष्कलत्वेनसकलत्वे न तदभवेत् ||

 

प्रसादंकुरुमे नाथ नि:शेषंछिन्धिसंशयम् |

 

भैरव उवाच

साधु साधुत्वयापृष्टंतन्त्रसारमिदंप्रिये |


गूहनीयतमं भद्रे तथापिकथयामि ते |

यत्किञ्चित्सकलं रुपं भैरवस्यप्रकीर्तितम् ||

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देवीने प्रश्न किया...

 

हे शिवा! आपका सत्य स्वरूप क्या है?

यह आश्चर्य से भरा जगत्क्या है?

बीज का मूलतत्वक्या है?

संसाररुपी चक्र के केंद्रस्थान पर क्या है?

सगुण विश्व के परे क्या है?

निर्गुण अमृतत्वको पाना क्या संभव है?

कृपया मेरे प्रश्नों का समाधान किजीये...

 

शिव ने उत्तर स्वरूप ११२ ध्यानतंत्र का प्रस्फुटन किया | अखिल विश्व के सभी पंथ-संप्रदाय इसीके एक अथवा अधिक तंत्र पद्धती केउपयोग से उत्पन्न हुए है | भूत, वर्तमान और भविष्य के संत, प्रेषित इसी तंत्र पद्धती के फलस्वरूप है |

 

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देवीने विचारले...

 

हे शिवा! तुझे खरे स्वरुप काय आहे?

हे अचंबित करणारे जगत काय आहे?

बीजाचे मूलतत्व काय आहे?

संसाररुपी चक्राच्या केंद्रस्थानी काय आहे?

नामरुपांच्यापलिकडे काय आहे?

नामरुपातीतअमृतत्वाची प्राप्ती शक्य आहे का?

कृपया माझे शंकानिरसन करा...

 

शिवाने उत्तरादाखल ११२ ध्यानतंत्रे सांगितली. ज्ञात-अज्ञात विश्वातील सर्व पंथसंप्रदाय,ज्ञानमार्ग यातील एक अथवा अधिक तंत्र पद्धतीद्वारा उत्पन्न झाले. भूतवर्तमान तसेच भविष्य काळातील तत्त्ववेत्तेप्रेषित यातील एक अथवा अधिक तंत्रपद्धतीचे फलस्वरुप आहेत.  

 

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 Devi Asks:

O Shiva, what is your reality?

What is this wonder-filled universe?

What constitutes seed?

Who centres the universal wheel?

What is this life beyond form pervading forms?

How may we enter it full, above space and time, names and descriptions?

Let my doubts be cleared!


Now Shiva replies and describes 112 meditation techniques.  All the religions of the world, all the seers of the world, have reached the peak through some technique or other, and all those techniques will be in these one hundred and twelve techniques.

 

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तंत्र ७८

 

इंद्रजालमयं विश्वं व्यस्तं वा चित्रकर्मवत |

भ्रमद्वा ध्यायतः सर्वं पश्यतश्च सुखोदगमः ||

Meditating on the manifest world as imagined or illusive, like a magic show or a painting, and seeing all existence as transient, happiness arise.

 

यह सारा विश्व यद्यपि ग्राह्य और ग्राहक के रूप में दिखाई पडता है, किंतु अनुभव और तर्क के द्वारा परिष्कृत बुद्धि से इसके स्वरूप पर विचार किया जाता है तो ये सब इंद्रजाल की तरह माया से निर्मित, कपडे, कागज आदी पर बनाये चित्र के समान कल्पित, अथवा नाव आदि सवारी पर चढ कर चलने पर जैसे वृक्ष-पर्वत आदि चलते हुए से नजर आते है, उसी तरह से भ्रमपूर्ण, कल्पना से प्रसृत मालूम पडते है | इस सही स्थिती का ज्ञान हो जाने पर और उसी में अपने ध्यान को केंद्रित कर देने पर योगी के चित्त में अक्षय सुख का अविर्भाव होता है |

 

 

With attentiveness each act can become meditative

(Dharana on the illusive nature of life)

 

In universe everything reflects back to you and can be used as a mirror to realize yourself. But due to excessive interference of mind, you are not in present moment to receive it. With pure attention, you can transcend mind to remain in present and thus can be aware of object and subject together. Generally we miss either due to thoughts. Become aware of both the ends of the knowledge, to make your each act meditative. We throw life energy through senses which can come back with attentiveness provided you are in present moment during each act.

 

 

विचारशून्यतेत आत्मानुभूती...

 

विचार न करता वस्तू अथवा व्यक्तीवर लक्ष केंद्रीत करा. वस्तूचा विचार करणे आणी वस्तूकडे पहाणे या दोन भिन्न गोष्टी. विचारशून्य तटस्थतेमध्ये ज्ञेय व ज्ञाता या ज्ञानाच्या दोन्ही दिशांचे एका वेळीस ज्ञान होऊन त्या पलिकडील'स्व' चीअनुभूती. प्रत्येक सामान्य कृती करताना याचा अभ्यास करणे शक्य. प्रत्येक कृती मनाद्वारे करण्याच्या सवयीमुळे सदैव भविष्यकाळाचा विचार आणी वर्तमानकाळाचा विसर. विचारशून्य तटस्थतेमध्ये प्रत्येक कृती ध्यानावस्था.   

 

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