Monday, March 23, 2020

Meditation techniques (ध्यान तंत्र: (VBT42) विज्ञान भैरव तंत्र ४२)


हर मास में, आपके सामने में एक ध्यानतंत्र रखुंगा | इसमें मूल संस्कृत श्लोक के साथ स्वामी सत्यसंगानंदा सरस्वती द्वारा किया हुआ अंग्रेजीमें वस्तुतः अनुवाद रहेगा | तथा हिंदीमें व्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा लिखा हुआ हिंदी भावानुवाद रहेगा | अन्तमें ओशो रजनीश द्वारा उस ध्यान तंत्र पर दिये हुए भाषण का सार तथा उसका मैने किया हुआ मराठी भावानुवाद रहेगा |
मेरा आपसे अनुरोध है की यह ध्यान तंत्र केवल जानकारी हेतू पढने के बजाय इसकी अनुभूती करने का प्रयास करे | अपने स्वभाव विशेष के अनुसार इसमेसे एक ही तंत्र आपको अंतिम अनुभूती देनेमें सक्षम है | इसकी खोज आपको करनी है |
हरी ओम त् सत् !           
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Every month I will be sharing one technique of meditation. There will be original Sanskrut text, and English / Marathi / Hindi commentary on the technique. I expect reader should not take it as just a piece of information but practice the technique that suits him/her for at least one month to further the spiritual quest.

| These 112 meditation techniques are the ultimate source for self realization | 


विज्ञान भैरव तंत्र    
VidnyanBhairav Tantra

श्री देव्युवाच
श्रुतं देव मया सर्वं रुद्रयामलसम्भवम् |
त्रिकभेदमशेषेणसारात्सारविभागशः ||

अद्यपि न निवृत्तोमे संशय: परमेश्वर |
किं रुपं तत्वतो देव शब्दराशिकलामयम् ||

किं वा नवात्मभेदेन भैरवे भैरवाकृतौ |
त्रिशिरोभेदभिन्नं वा किं वा शक्तित्रयात्मकम् ||

नादबिन्दुमयंवापिकिंचंद्रार्धनिरोधिका: |
चक्रारुढमनच्कं वा किं वा शक्तिस्वरुपकम् ||


परापराया: सकलम्अपरायाश्च वा पुनः |
परायायदितद्वत्स्यात्परत्वंतद्विरुध्यते ||

नहि वर्ण विभेदेनदेहभेदेन वा भवेत् |
परत्वंनिष्कलत्वेनसकलत्वे न तदभवेत् ||

प्रसादंकुरुमे नाथ नि:शेषंछिन्धिसंशयम् |


भैरव उवाच
साधु साधुत्वयापृष्टंतन्त्रसारमिदंप्रिये |

गूहनीयतमं भद्रे तथापिकथयामि ते |
यत्किञ्चित्सकलं रुपं भैरवस्यप्रकीर्तितम् ||

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देवीने प्रश्न किया...

हे शिवा! आपका सत्य स्वरूप क्याहै?
यह आश्चर्य से भरा जगत्क्याहै?
बीज का मूलतत्वक्याहै?
संसाररुपी चक्र के केंद्रस्थान पर क्याहै?
सगुण विश्व के परेक्याहै?
निर्गुण अमृतत्वको पाना क्या संभव है?
कृपया मेरेप्रश्नों का समाधान किजीये...

शिव ने उत्तर स्वरूप ११२ ध्यानतंत्र का प्रस्फुटन किया | अखिल विश्व के सभी पंथ-संप्रदाय इसीके एक अथवा अधिक तंत्र पद्धती केउपयोग से उत्पन्न हुए है | भूत, वर्तमान और भविष्य के संत, प्रेषित इसी तंत्र पद्धती के फलस्वरूप है |

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देवीने विचारले...

हे शिवा! तुझे खरे स्वरुप काय आहे?
हे अचंबित करणारे जगत काय आहे?
बीजाचे मूलतत्व काय आहे?
संसाररुपी चक्राच्या केंद्रस्थानी काय आहे?
नामरुपांच्यापलिकडे काय आहे?
नामरुपातीतअमृतत्वाची प्राप्ती शक्य आहे का?
कृपया माझे शंकानिरसन करा...

शिवाने उत्तरादाखल ११२ ध्यानतंत्रे सांगितली. ज्ञात-अज्ञात विश्वातील सर्व पंथसंप्रदाय,ज्ञानमार्ग यातील एक अथवा अधिक तंत्र पद्धतीद्वारा उत्पन्न झाले. भूतवर्तमान तसेच भविष्य काळातील तत्त्ववेत्तेप्रेषित यातील एक अथवा अधिक तंत्रपद्धतीचेफलस्वरुप आहेत.  

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 Devi Asks:

O Shiva, what is your reality?
What is this wonder-filled universe?
What constitutes seed?
Who centres the universal wheel?
What is this life beyond form pervading forms?
How may we enter it full, above space and time, names and descriptions?
Let my doubts be cleared!

Now Shiva replies and describes 112 meditation techniques.  All the religions of the world, all the seers of the world, have reached the peak through some technique or other, and all those techniques will be in these one hundred and twelve techniques.

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तंत्र ४२

कुहनेन प्रयोगेण सद्य एव मृगेक्षणे |
समुदेति महानन्दो येन तत्वं प्रकाशते ||
O gazelle-eyed one, verily by applying the performance of austerities, great bliss arises immediately, by which the essence is illumined.

हे मृगनयनि. कुहन प्रयोग (जादु का खेल) मनुष्य के मन में तत्काल विस्मय पैदा करता है | जादूगर जब अपने जादु के विविध प्रयोग के माध्यम से देखनेवाले के मन में आश्चर्यभाव पैदा करता है | इसी तरह के अद्भुत आनंद से परिपूर्ण मिथ्या परिस्थितीयोपर अपनी भावना केंद्रित करने वाले योगी के चित्त में तत्काल परम आनंद का उदय होने से वह निर्विकल्प दशा में आरूढ हो जाता है, जिससे कि उसका भैरव स्वरूप प्रकट होने लगता है |  

Intone any sound first audibly and then inaudibly to enter into silence
(Dharana on austerity)

Use any sound for intoning which has some feeling for you. Mind is chaos of many sounds. Use single sound to go beyond it. Silence is possible only when mind is dissolved. Intoning of particular sound helps to reach the feeling behind that sound, and only feeling can enter into the heart. If particular sound creates warmth in you then only you have feeling for that sound. First recite the sound audibly and then go on reducing it so much so that you need alertness to hear it inside. When sound disappears, only feeling remains. Use same place and time for intoning same sound. Vibrations will help you to fall into silence soon. Temples are designed for such purposes.

मंत्रातील नादाच्या अनुभूतीतून नादरहित अवस्थेचा प्रत्यय...

कोणत्याही शब्दाचा मंत्रासारखा वापर शक्य, केवळ त्या शब्दामागील भावनेची जाणीव असणे आवश्यक. प्रथम शब्द, नंतर ध्वनी आणी त्यानंतर केवळ भावना शिल्लक राहते जी हृदयात प्रवेश करु शकते. शब्द केवळ मेंदूपुरते मर्यादित, हृदयात प्रवेश अशक्य. मन म्हणजे नाद, नादरहित अवस्थेत मनरहित अवस्था. मनामध्ये अनेक नादांचे अस्तित्व. प्रथम एका नादावर ल्क्षकेंद्रीतकरुन नंतर त्याचाही त्याग केल्यास नादरहित अवस्थेचा प्रत्यय. यासाठी मूलतः देवळांची निर्मिती.   

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