Tuesday, March 31, 2026

Meditation techniques (ध्यान तंत्र: VBT विज्ञान भैरव तंत्र ) 112a

हर मास में, आपके सामने में एक ध्यानतंत्र रखुंगा | इसमें मूल संस्कृत श्लोक के साथ स्वामी सत्यसंगानंदा सरस्वती द्वारा किया हुआ अंग्रेजीमें वस्तुतः अनुवाद रहेगा | तथा हिंदीमें व्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा लिखा हुआ हिंदी भावानुवाद रहेगा | अन्तमें ओशो रजनीश द्वारा उस ध्यान तंत्र पर दिये हुए भाषण का सार तथा उसका मैने किया हुआ मराठी भावानुवाद रहेगा |

मेरा आपसे अनुरोध है की यह ध्यान तंत्र केवल जानकारी हेतू पढने के बजाय इसकी अनुभूती करने का प्रयास करे | अपने स्वभाव विशेष के अनुसार इसमेसे एक ही तंत्र आपको अंतिम अनुभूती देनेमें सक्षम है | इसकी खोज आपको करनी है |

हरी ओम त् सत् !             

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Every month I will be sharing one technique of meditation. There will be original Sanskrut text, and English / Marathi / Hindi commentary on the technique. I expect reader should not take it as just a piece of information but practice the technique that suits him/her for at least one month to further the spiritual quest.

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ज्ञानप्रकाशकम सर्वं सर्वेणात्मा प्रकाशकः |

एकमेकस्वभावत्वात ज्ञानं ज्ञेयं विभाव्यते ||

 

Knowledge reveals all and the self of all is the revealer. One should contemplate on the knowledge and the knower as being one and the same.

 

 

सभी प्रकाश्य अर्थात वेद्य वस्तुए ज्ञान से प्रकाशित होती है | प्रकाशक ज्ञान आत्मा से भिन्न नही है और सभी शब्दो से बोधित होने वाले ज्ञेय पदार्थ भी ज्ञान से पृथक नही है | इस तरह से ज्ञान और ज्ञेय की एकता की भावना करने से साधक स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है | सब कुछ चिन्मय है, ऐसी भावना करने से तत्वज्ञानी को यह प्रतीत होने लागता है कि ओ ज्ञान है, वही ज्ञेय अथवा ज्ञाता भी है | सबकुछ प्रकाशात्मक शिवमय है | इस प्रकार के ज्ञान का उन्मेष होने पर साधक शिव बन जाता है |

 

 

I am the knower

(Dharana on knowledge and knower)

This dharana referes to the heightened state of samadhi. Although there are many stages of samadhi, the two main categories are sabija and nirbija or samprajnata and asampajnata. In the later one, all dualities cease and consciousness remains steady despite the absence of any alambana or support in the form of thoughts and samskaras.

 

 

सर्व प्रकाशित वस्तू, म्हणजेच ज्या वस्तूंचे निरीक्षण करता येते, त्या ज्ञानाने प्रकाशित होतात. हे प्रकाशित करणारे ज्ञान आत्म्यापेक्षा वेगळे नाही आणि सर्व शब्दांद्वारे ज्ञात होणाऱ्या वस्तूदेखील ज्ञानापेक्षा वेगळ्या नाहीत. अशा प्रकारे ज्ञान आणि ज्ञात यांच्या एकत्वाची जाणीव झाल्याने, साधक आत्म्याच्या खऱ्या स्वरूपात स्थापित होतो. सर्व काही चैतन्य आहे हे जाणल्याने, सत्यज्ञानी व्यक्तीला हे जाणवू लागते की, जे काही ज्ञान आहे तेच ज्ञेय किंवा जाणणारा आहे. सर्व काही प्रकाशित करणारा शिव आहे. अशा प्रकारच्या ज्ञानाच्या जागृतीमुळे, साधक शिव बनतो.

 

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