Friday, September 30, 2022

Meditation techniques (ध्यान तंत्र: (VBT 71) विज्ञान भैरव तंत्र ७१)

हर मास में, आपके सामने में एक ध्यानतंत्र रखुंगा | इसमें मूल संस्कृत श्लोक के साथ स्वामी सत्यसंगानंदा सरस्वती द्वारा किया हुआ अंग्रेजीमें वस्तुतः अनुवाद रहेगा | तथा हिंदीमें व्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा लिखा हुआ हिंदी भावानुवाद रहेगा | अन्तमें ओशो रजनीश द्वारा उस ध्यान तंत्र पर दिये हुए भाषण का सार तथा उसका मैने किया हुआ मराठी भावानुवाद रहेगा |

मेरा आपसे अनुरोध है की यह ध्यान तंत्र केवल जानकारी हेतू पढने के बजाय इसकी अनुभूती करने का प्रयास करे | अपने स्वभाव विशेष के अनुसार इसमेसे एक ही तंत्र आपको अंतिम अनुभूती देनेमें सक्षम है | इसकी खोज आपको करनी है |

हरी ओम त् सत् !           

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Every month I will be sharing one technique of meditation. There will be original Sanskrut text, and English / Marathi / Hindi commentary on the technique. I expect reader should not take it as just a piece of information but practice the technique that suits him/her for at least one month to further the spiritual quest.

 

| These 112 meditation techniques are the ultimate source for self realization |  

 

विज्ञान भैरव तंत्र    

VidnyanBhairav Tantra

 

श्री देव्युवाच

श्रुतं देव मया सर्वं रुद्रयामलसम्भवम् |

त्रिकभेदमशेषेणसारात्सारविभागशः ||

 

अद्यपि न निवृत्तोमे संशय: परमेश्वर |

किं रुपं तत्वतो देव शब्दराशिकलामयम् ||

 

किं वा नवात्मभेदेन भैरवे भैरवाकृतौ |

त्रिशिरोभेदभिन्नं वा किं वा शक्तित्रयात्मकम् ||

 

नादबिन्दुमयंवापिकिंचंद्रार्धनिरोधिका: |

चक्रारुढमनच्कं वा किं वा शक्तिस्वरुपकम् ||

 

परापराया: सकलम्अपरायाश्च वा पुनः |

परायायदितद्वत्स्यात्परत्वंतद्विरुध्यते ||

 

नहि वर्ण विभेदेनदेहभेदेन वा भवेत् |

परत्वंनिष्कलत्वेनसकलत्वे न तदभवेत् ||

 

प्रसादंकुरुमे नाथ नि:शेषंछिन्धिसंशयम् |

 

भैरव उवाच

साधु साधुत्वयापृष्टंतन्त्रसारमिदंप्रिये |

 

गूहनीयतमं भद्रे तथापिकथयामि ते |

यत्किञ्चित्सकलं रुपं भैरवस्यप्रकीर्तितम् ||

 

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देवीने प्रश्न किया...

 

हे शिवा! आपका सत्य स्वरूप क्या है?

यह आश्चर्य से भरा जगत्क्या है?

बीज का मूलतत्वक्या है?

संसाररुपी चक्र के केंद्रस्थान पर क्या है?

सगुण विश्व के परे क्या है?

निर्गुण अमृतत्वको पाना क्या संभव है?

कृपया मेरे प्रश्नों का समाधान किजीये...

 

शिव ने उत्तर स्वरूप ११२ ध्यानतंत्र का प्रस्फुटन किया | अखिल विश्व के सभी पंथ-संप्रदाय इसीके एक अथवा अधिक तंत्र पद्धती केउपयोग से उत्पन्न हुए है | भूत, वर्तमान और भविष्य के संत, प्रेषित इसी तंत्र पद्धती के फलस्वरूप है |

 

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देवीने विचारले...

 

हे शिवा! तुझे खरे स्वरुप काय आहे?

हे अचंबित करणारे जगत काय आहे?

बीजाचे मूलतत्व काय आहे?

संसाररुपी चक्राच्या केंद्रस्थानी काय आहे?

नामरुपांच्यापलिकडे काय आहे?

नामरुपातीतअमृतत्वाची प्राप्ती शक्य आहे का?

कृपया माझे शंकानिरसन करा...

 

शिवाने उत्तरादाखल ११२ ध्यानतंत्रे सांगितली. ज्ञात-अज्ञात विश्वातील सर्व पंथसंप्रदाय,ज्ञानमार्ग यातील एक अथवा अधिक तंत्र पद्धतीद्वारा उत्पन्न झाले. भूतवर्तमान तसेच भविष्य काळातील तत्त्ववेत्तेप्रेषित यातील एक अथवा अधिक तंत्रपद्धतीचे फलस्वरुप आहेत.  

 

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 Devi Asks:

 

O Shiva, what is your reality?

What is this wonder-filled universe?

What constitutes seed?

Who centres the universal wheel?

What is this life beyond form pervading forms?

How may we enter it full, above space and time, names and descriptions?

Let my doubts be cleared!

 

Now Shiva replies and describes 112 meditation techniques.  All the religions of the world, all the seers of the world, have reached the peak through some technique or other, and all those techniques will be in these one hundred and twelve techniques.

 

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तंत्र ७१


माया विमोहिनी नाम कलायाः कलनं स्थितम |

इत्यादिधर्मम तत्वानां कालयन्न पृथग्भवेत ||

Maya us the delusive principle residing in manifested existence, causing name and limited activity. Considering thus the nature or functions of the various elements, one realizes that he is not separate from the supreme reality.

 

माया तत्व से मोहित होकर जीव परस्पर एक दूसरे को भिन्न समझने लगते है | अतः भेद-दृष्टी का विस्तार करना माया का धर्म है, शुद्ध चैतन्य का नही | इसी प्रकार कला तत्व का धर्म कुछ करना है, विद्या तत्व का धर्म कुछ जानना है | इसी तरह से सभी तत्वो के धर्मो के विषय में विचार करने वाले योगी की स्थिती अलग से नही रह जाती, किन्तु इस विवेक के सहारे वह अभेद ख्याती से युक्त हो जाता है | प्रकृती और पुरुष के विवेक ज्ञान से कैवल्य का अविर्भाव सांख्य दर्शन को अभिप्रेत है | इस भावना के अभ्यास से माया प्रभृति के विभेदक स्वरुपो से अलग होकर योगी अपने कैवल्यात्मक स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्टीत हो जाता है |  

 

Feel light rays rising as sparks trough spine

(Dharana on the nature of the elements)

 

Light rays are never gradual but in the form of packets called quanta. Our eyes cannot conceive the darkness in between. Energy too jumps from one chakra to another. Depending upon the individual nature one can direct energy upwards through chakras.

 

शक्तीपुंजाच्या स्वरुपात चक्रांद्वारा जीवनशक्तीचे वहन...

 

प्रकाशाचे वहन सदैव खंडित शक्तीपुंजात. दोन शक्तीपुंजातील अत्यंत सुक्ष्मअंधःकाराची जाणीव नाही. मुलाधारचक्रातुनअधो अथवा उर्ध्वदिशेने शक्तीचे वहन. प्रयत्नपूर्वकसहस्रार चक्राकडे  वहन झाल्यास जीवन्मुक्ततेचा अनुभव. 

 

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